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10 जनवरी 2026

   

क्लेम रिजेक्शन क्यों होता है? ‘Medical Necessity’ और आपके कानूनी अधिकार

Medical Necessity और आपके कानूनी अधिकार
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बीमारी बताकर नहीं आती, और जब आती है तो हम सबसे पहले डॉक्टर की सलाह मानते हैं। अगर डॉक्टर कहते हैं, "मरीज को तुरंत एडमिट करना पड़ेगा," तो हम एक पल भी नहीं सोचते। लेकिन सोचिए, इलाज के बाद जब आप इंश्योरेंस कंपनी को बिल भेजते हैं, और वहां से जवाब आता है— "क्लेम रिजेक्टेड: मरीज को अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत नहीं थी, घर पर इलाज हो सकता था।"

यह सुनना किसी सदमे से कम नहीं होता। लाखों का प्रीमियम भरने के बाद भी अगर अपनी जेब से इलाज करवाना पड़े, तो पॉलिसी का क्या फायदा?

आज के इस आर्टिकल में हम लाइफ इंश्योरेंस और हेल्थ इंश्योरेंस से जुड़े एक सबसे पेचीदा शब्द 'Medically Necessary Hospitalization' (अस्पताल में भर्ती होने की चिकित्सीय आवश्यकता) को डिकोड करेंगे। हम एक सत्यापित कोर्ट केस के जरिए समझेंगे कि कानून आपके साथ कैसे खड़ा है और एक एजेंट या पॉलिसी होल्डर के रूप में आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

'Medically Necessary Hospitalization' आखिर है क्या?

साधारण भाषा में समझें तो इसका मतलब है—क्या मरीज की हालत इतनी गंभीर थी कि उसका इलाज घर पर न होकर सिर्फ अस्पताल में ही हो सकता था?

IRDAI (भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण) की परिभाषा के अनुसार, कोई भी इलाज 'Medically Necessary' तब माना जाता है जब:

  • वह डॉक्टर द्वारा लिखित में (Prescribed) हो।
  • इलाज का स्तर (Level of Care) सुरक्षित और उचित हो।
  • वह इलाज भारत या अंतरराष्ट्रीय मेडिकल मानकों (Standards) के अनुरूप हो।
  • वह केवल मरीज की सुविधा या आराम (जैसे पर्सनल नर्स या लग्जरी रूम) के लिए न हो।

नोट: IRDAI की विस्तृत परिभाषा वाली PDF फाइल हमारी वेबसाइट पर उपलब्ध करा दी जाएगी, जिसे आप डाउनलोड कर सकते हैं।

'डे-केयर ट्रीटमेंट' और 'घर पर इलाज' में अंतर

अक्सर लोग सोचते हैं कि क्लेम लेने के लिए अस्पताल में कम से कम 24 घंटे भर्ती रहना अनिवार्य है। लेकिन मेडिकल साइंस की तरक्की और इंश्योरेंस के नियमों ने अब इसे बदल दिया है। 'Medically Necessary' को ठीक से समझने के लिए इन दो शर्तों को जानना ज़रूरी है:

  • डे-केयर ट्रीटमेंट (Day Care Treatment):

    टेक्नोलॉजी इतनी आगे बढ़ गई है कि जो सर्जरी या इलाज पहले 2-3 दिन लेते थे, अब वो कुछ घंटों में हो जाते हैं। जैसे मोतियाबिंद (Cataract), कीमोथेरेपी, या डायलिसिस।

    नियम: इसे 'भर्ती' ही माना जाता है, भले ही आप 24 घंटे से कम समय के लिए अस्पताल में हों। लेकिन, यह इलाज पॉलिसी में लिस्टेड होना चाहिए।

  • डोमिसिलीरी हॉस्पिटलाइजेशन

    इसे आम भाषा में "घर पर इलाज" कहते हैं। लेकिन सावधान रहें! यह आपकी 'मर्जी' (Choice) से नहीं, बल्कि 'मजबूरी' (Condition) में मिलता है।

    नियम: इसका क्लेम तभी मिलता है जब मरीज की हालत इतनी गंभीर हो कि उसे अस्पताल नहीं ले जाया जा सकता, या अस्पताल में कोई बेड खाली न हो। सिर्फ इसलिए कि "मुझे अस्पताल पसंद नहीं है," आप इसका क्लेम नहीं ले सकते।

एक नज़र में अंतर समझें:

आधार डे-केयर ट्रीटमेंट डोमिसिलीरी हॉस्पिटलाइजेशन
स्थान अस्पताल या क्लिनिक में होता है। मरीज के घर पर होता है।
समय 24 घंटे से कम। आमतौर पर 3 दिन से अधिक का इलाज।
वजह तकनीकी उन्नति के कारण इलाज जल्दी हो जाता है। मरीज की गंभीर हालत या अस्पताल में बेड की कमी।
उदाहरण मोतियाबिंद सर्जरी, रेडियोथेरेपी, डायलिसिस। लकवा (Paralysis), गंभीर अस्थमा, या कोमा जैसी स्थिति (यदि डॉक्टर घर पर सेटअप लगाए)।
क्लेम की शर्त इलाज 'डे-केयर लिस्ट' में होना चाहिए। डॉक्टर का प्रमाण पत्र ज़रूरी है कि "अस्पताल ले जाना संभव नहीं था।"

समस्या कहाँ आती है?

अक्सर विवाद तब होता है जब आपके डॉक्टर को लगता है कि "भर्ती करना ज़रूरी है," लेकिन इंश्योरेंस कंपनी के डॉक्टर्स की टीम को लगता है कि "यह इलाज तो गोलियों से घर पर भी हो सकता था।" इसे "Active Line of Treatment" का मुद्दा कहा जाता है।

कंपनियां अक्सर यह कहकर क्लेम रोक देती हैं कि आप सिर्फ 'ऑब्जर्वेशन' (निगरानी) या 'आइसोलेशन' के लिए भर्ती हुए थे। लेकिन क्या कंपनी का फैसला अंतिम होता है? जवाब है— नहीं!

केस स्टडी: जब कोर्ट ने कहा— "इलाज का फैसला डॉक्टर करेगा, बीमा कंपनी नहीं"

आइए, एक हालिया और महत्वपूर्ण केस पर नज़र डालते हैं जो हर पॉलिसीहोल्डर के लिए एक जीत की तरह है। यह जानकारी सत्यापित शोध पर आधारित है।

मामला: अजय नागर और नीतू नागर बनाम स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस।

घटना: जनवरी 2022 (कोविड-19 की तीसरी लहर)।

क्या हुआ था: नीतू नागर को तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ हुई। डॉक्टर ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की सलाह दी। इलाज हुआ, मरीज ठीक होकर घर आ गया। लेकिन जब क्लेम फाइल किया गया, तो स्टार हेल्थ (Star Health) ने यह कहकर क्लेम खारिज कर दिया कि मरीज के लक्षण "हल्के" (Mild) थे और उनका इलाज घर पर आइसोलेशन में किया जा सकता था।

कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (दिसंबर 2025): जिला उपभोक्ता फोरम ने इस मामले में पॉलिसीहोल्डर के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि:

"बीमा कंपनी एसी कमरे में बैठकर यह तय नहीं कर सकती कि मरीज का इलाज कैसे होना चाहिए। मरीज को भर्ती करना है या नहीं, यह फैसला केवल इलाज कर रहे डॉक्टर का ही सर्वोपरि माना जाएगा।"

नतीजा: कोर्ट ने स्टार हेल्थ को सेवा में कमी का दोषी पाया और आदेश दिया कि वे:

  • ₹50,000 का हर्जाना दें।
  • इस राशि पर 6% वार्षिक ब्याज दें।
  • ₹2,000 कानूनी खर्च (Litigation Cost) के रूप में भुगतान करें।

यह केस साबित करता है कि अगर आपके पास सही कागजात हैं और डॉक्टर की सलाह पक्की है, तो इंश्योरेंस कंपनी मनमानी नहीं कर सकती।

बीमा लोकपाल (Ombudsman): आपकी मदद के लिए एक मज़बूत साथी

अगर कंपनी आपकी बात न सुने, तो आपको सीधे कोर्ट जाने की भी ज़रूरत नहीं है। आप बीमा लोकपाल (Insurance Ombudsman) के पास जा सकते हैं। यह प्रक्रिया बहुत सरल और निशुल्क है।

नई अपडेट (नवंबर 2023 के बाद): पहले लोकपाल केवल 30 लाख रुपये तक के क्लेम सुनता था, लेकिन अब यह सीमा बढ़ा दी गई है।

विवरण पुरानी सीमा नई सीमा (वर्तमान)
अधिकतम क्लेम राशि ₹30 लाख ₹50 लाख
मानसिक पीड़ा का मुआवजा कम था ₹1 लाख तक
परिणामी हानि कम था ₹20 लाख तक
ध्यान दें: यह 50 लाख की सीमा में आपके क्लेम की राशि + मानसिक उत्पीड़न का मुआवजा शामिल है। अगर आपका मामला 50 लाख से ऊपर का है, तो आपको कंज्यूमर कोर्ट या अन्य कानूनी रास्ते अपनाने होंगे।

नॉन-मेडिकल खर्च (Non-Medical Expenses)

अक्सर ऐसा होता है कि कंपनी मान लेती है कि आपका हॉस्पिटलाइजेशन "Medically Necessary" (ज़रूरी) था, क्लेम पास भी हो जाता है, लेकिन जब बैंक में पैसे आते हैं, तो वो आपके बिल से 10-20% कम होते हैं।

गुस्सा आना लाज़िमी है, लेकिन इसका कारण छिपा होता है 'Non-Medical Expenses' (गैर-चिकित्सकीय खर्च) की लिस्ट में।

ये 'नॉन-मेडिकल खर्च' क्या हैं- इंश्योरेंस कंपनियां मानती हैं कि वे आपके 'इलाज' का पैसा देंगी, आपकी 'सुविधा' या 'साफ-सफाई' के सामान का नहीं। इसे Consumables भी कहा जाता है। इसमें आम तौर पर शामिल होते हैं:

  • ग्लव्स, मास्क, और पीपीई किट (PPE Kits)।
  • सैनिटाइजर, साबुन, या टिशू पेपर।
  • हॉउसकीपिंग चार्ज या रजिस्ट्रेशन फीस।
  • डाइपर, सिरिंज, या डिस्पोजेबल रेज़र।

हालांकि, IRDAI के नए दिशा-निर्देशों (2024-25) के बाद कई कंपनियों ने अब इन खर्चों को कवर करना शुरू कर दिया है, लेकिन यह तभी मिलता है जब आपने अपनी पॉलिसी में 'Consumables Rider' या 'Care 360' जैसा कोई ऐड-ऑन (Add-on) लिया हो।

ध्यान दें: अगर आपकी पॉलिसी पुरानी है (3-4 साल पहले की), तो हो सकता है कि उसमें ये खर्च कवर न हों। इसलिए क्लेम फाइल करते समय अपनी जेब से 5-10 हज़ार रुपये भरने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहें, भले ही आपका क्लेम 100% पास हो जाए।

अब आपको क्या करना चाहिए?

एक जागरूक पॉलिसीहोल्डर या स्मार्ट एजेंट के तौर पर, आपको क्लेम रिजेक्शन से बचने के लिए डिस्चार्ज के समय ही सतर्क रहना होगा। यहाँ कुछ ज़रूरी टिप्स हैं:

फ्री डाउनलोड: IRDAI की आधिकारिक परिभाषा

सिर्फ सुनी-सुनाई बातों पर निर्भर न रहें। जब आप इंश्योरेंस कंपनी या लोकपाल (Ombudsman) के सामने अपना पक्ष रखें, तो आपके हाथ में लिखित सबूत होना चाहिए।

हमने आपके लिए IRDAI की वेबसाइट से 'Medically Necessary' की आधिकारिक परिभाषा की PDF फाइल यहाँ उपलब्ध कराई है। इसे डाउनलोड करें और अपने पास सुरक्षित रखें। भविष्य में क्लेम विवाद के समय यह दस्तावेज आपके लिए 'ब्रह्मास्त्र' का काम करेगा।

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डिस्चार्ज समरी को ध्यान से पढ़ें

यह सिर्फ दवाइयों की पर्ची नहीं, बल्कि आपका सबसे बड़ा कानूनी सबूत है। अपने डॉक्टर से निवेदन करें कि वे डिस्चार्ज समरी में यह साफ़-साफ़ लिखें कि "भर्ती करना क्यों अनिवार्य था।"

  • गलत तरीका: "मरीज को बुखार था, एडमिट किया गया।"
  • सही तरीका: "मरीज को 103 डिग्री बुखार था जो ओरल दवाइयों से कम नहीं हो रहा था, साथ ही ऑक्सीजन लेवल गिर रहा था, इसलिए IV फ्लूड और निरंतर निगरानी के लिए भर्ती करना चिकित्सकीय रूप से आवश्यक (Medically Necessary) था।"

कागजी कार्रवाई पूरी रखें

डॉक्टर की पहली पर्ची (Prescription) जिसमें 'Admission Advised' लिखा हो, उसे कभी न खोएं।

हार न मानें

अगर कंपनी क्लेम रिजेक्ट करे, तो उसे अंतिम फैसला न समझें। पहले कंपनी के 'Grievance Redressal Officer' को लिखें। अगर 30 दिनों में जवाब न मिले या आप संतुष्ट न हों, तो बीमा लोकपाल (Ombudsman) का दरवाजा खटखटाएं।

स्मार्ट चेकलिस्ट

अस्पताल छोड़ते समय (Discharge) ये 5 कागज़ जरूर चेक करें, जल्दबाजी में डिस्चार्ज न लें। काउंटर छोड़ने से पहले अपनी फाइल में ये चीज़ें टिक करें:

  • डिस्चार्ज समरी (Discharge Summary): सबसे महत्वपूर्ण! चेक करें कि इसमें "Admission Reason" (भर्ती का कारण) साफ लिखा हो।
  • फाइनल बिल (Detailed Breakup): सिर्फ कुल रकम नहीं, बल्कि हर सुई और दवा का अलग-अलग हिसाब (Breakup) मांगें।
  • लैब रिपोर्ट्स (Lab Reports): एक्स-रे फिल्मों और एमआरआई (MRI) की ओरिजिनल रिपोर्ट और फिल्में साथ लें।
  • फार्मेसी बिल: अस्पताल के अंदर से खरीदी गई दवाइयों के पक्के बिल, जिन पर डॉक्टर की पर्ची (Prescription) मैच होती हो।
  • पेमेंट रसीद: अगर आपने कैशलेस नहीं, बल्कि रिइम्बर्समेंट (Reimbursement) क्लेम करना है, तो 'Paid Stamp' लगी हुई रसीद लेना न भूलें।

निष्कर्ष

इंश्योरेंस पॉलिसी सिर्फ एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि मुसीबत के समय आपका सुरक्षा कवच है। 'Medically Necessary' जैसे शब्दों को कंपनी को अपने खिलाफ इस्तेमाल न करने दें। जैसा कि हमने अजय नागर जी के केस में देखा, कानून उपभोक्ता के साथ है, बशर्ते आप अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों।

अगर आप एक एजेंट हैं, तो अपने ग्राहकों को यह जानकारी जरूर दें। इससे न सिर्फ उनका क्लेम पास होगा, बल्कि आप पर उनका भरोसा भी बढ़ेगा।

अगला कदम: क्या आप चाहते हैं कि मैं आपको "बीमा लोकपाल में शिकायत दर्ज करने का स्टेप-बाय-स्टेप तरीका" समझाऊं? नीचे कमेंट करके बताएं!

डॉक्टर की सलाह पर अस्पताल में भर्ती होने से क्लेम मिलने की संभावना काफ़ी बढ़ जाती है, लेकिन यह अपने-आप में क्लेम की गारंटी नहीं होती।

बीमा कंपनी आमतौर पर यह देखती है कि भर्ती के दौरान Active Treatment हुआ है या नहीं। अगर मरीज को केवल आराम, निगरानी (Observation) या सामान्य टेस्ट के लिए एडमिट किया गया है, और इलाज सक्रिय रूप से नहीं चला, तो क्लेम पर आपत्ति हो सकती है।

इसलिए डिस्चार्ज समरी में भर्ती होने का स्पष्ट और ठोस मेडिकल कारण, इलाज की प्रक्रिया और दिए गए उपचार का उल्लेख होना बहुत महत्वपूर्ण होता है।

नहीं, बीमा लोकपाल अब केवल 50 लाख रुपये तक के मामलों (मुआवजे सहित) को सुन सकता है। इससे बड़े क्लेम के लिए आपको उपभोक्ता अदालत (Consumer Court) जाना होगा।

क्लेम रिजेक्ट होने के बाद आपके पास शिकायत करने के लिए एक निश्चित समय सीमा (आमतौर पर 1 साल लोकपाल के लिए) होती है। अपने पॉलिसी दस्तावेजों में दिए गए समय को चेक करें या किसी एक्सपर्ट से सलाह लें।

इसकी परिभाषा IRDAI द्वारा तय की गई है और यह मेडिकल साइंस के मानकों पर आधारित होती है। कोई भी इंश्योरेंस कंपनी अपनी मर्जी से इसे बदल नहीं सकती।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। यह कानूनी या पेशेवर वित्तीय सलाह नहीं है। किसी भी कानूनी कार्यवाही या क्लेम फाइलिंग के लिए, कृपया अपनी पॉलिसी के नियम और शर्तों को ध्यान से पढ़ें और किसी प्रमाणित बीमा सलाहकार या वकील से संपर्क करें। YMYL (Your Money Your Life) दिशानिर्देशों के तहत, हम सटीक जानकारी देने का प्रयास करते हैं, लेकिन नियमों में बदलाव संभव है।

09 जनवरी 2026

   

नौकरी छूटने पर हेल्थ इंश्योरेंस कैसे सुरक्षित रखें?

नौकरी छूटने पर हेल्थ इंश्योरेंस कैसे सुरक्षित रखें
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नौकरी छूटना किसी भी व्यक्ति के जीवन का सबसे अनिश्चित दौर हो सकता है। आय का स्रोत अचानक रुक जाना, भविष्य को लेकर असमंजस और परिवार की ज़िम्मेदारियाँ—ये सभी बातें मानसिक दबाव बढ़ा देती हैं। लेकिन इस पूरे तनाव के बीच एक ऐसा विषय भी होता है, जिस पर ज़्यादातर लोग समय रहते ध्यान नहीं देते—हेल्थ इंश्योरेंस

अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि कंपनी का दिया हुआ हेल्थ इंश्योरेंस कुछ समय तक चलता रहेगा या नई नौकरी मिलते ही फिर से सुरक्षा मिल जाएगी। लेकिन हेल्थ इंश्योरेंस के मामले में यह सोच कई बार भारी पड़ जाती है। क्योंकि बीमारी या दुर्घटना कभी समय देखकर नहीं आती, और अगर उस समय बीमा कवरेज नहीं हुआ, तो इलाज का खर्च सीधे व्यक्ति की जेब पर असर डालता है।

इस लेख में हम भावनात्मक दिलासे नहीं, बल्कि IRDAI द्वारा तय किए गए नियमों, समय-सीमाओं और व्यावहारिक विकल्पों के आधार पर यह समझेंगे कि नौकरी छूटने की स्थिति में हेल्थ इंश्योरेंस को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है।

कंपनी का हेल्थ इंश्योरेंस क्यों सबसे बड़ा जोखिम बन जाता है?

कॉर्पोरेट नौकरी में मिलने वाला हेल्थ इंश्योरेंस आमतौर पर ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी होता है। यह पॉलिसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि कंपनी की होती है और नौकरी से सीधे जुड़ी रहती है। जब तक व्यक्ति कंपनी में कार्यरत रहता है, तब तक यह कवरेज उसे और उसके परिवार को सुरक्षा देता है।

जैसे ही नौकरी समाप्त होती है, यह कवरेज भी समाप्त हो सकता है। अधिकतर मामलों में ग्रुप पॉलिसी Last Working Day तक ही वैध रहती है। नोटिस पीरियड पूरा होना या सैलरी सेटलमेंट इस कवरेज को अपने-आप आगे नहीं बढ़ाता। यही वह बिंदु है, जहाँ सबसे बड़ा जोखिम पैदा होता है।

अगर इसी समय कोई मेडिकल इमरजेंसी आ जाए, तो व्यक्ति बिना किसी बीमा सुरक्षा के खड़ा हो सकता है और इलाज का पूरा खर्च उसे खुद उठाना पड़ सकता है।

आम गलत धारणाएँ जो नुकसान का कारण बनती हैं

नौकरी छूटने और हेल्थ इंश्योरेंस को लेकर कुछ गलतफहमियाँ बहुत आम हैं। पहली यह कि कंपनी कुछ समय तक बीमा चालू रखेगी। कुछ विशेष मामलों में ऐसा हो सकता है, लेकिन यह कोई सामान्य नियम नहीं है।

दूसरी गलत धारणा यह है कि भारत में कोई ऐसा कानून होगा जो नौकरी छूटने के बाद भी बीमा सुरक्षा सुनिश्चित करता होगा। कई लोग दूसरे देशों के उदाहरण सुनकर ऐसा मान लेते हैं, लेकिन भारत में व्यवस्था अलग है। यहाँ बीमा नियामक ने अधिकार दिए हैं, लेकिन उन्हें सही समय पर इस्तेमाल करना ज़रूरी होता है।

तीसरी गलत धारणा यह होती है कि नई नौकरी मिलते ही सब ठीक हो जाएगा। नई नौकरी में नया बीमा कब लागू होगा और उसकी शर्तें क्या होंगी—यह पहले से तय नहीं होता।

सोच में बदलाव क्यों ज़रूरी है?

कंपनी का हेल्थ इंश्योरेंस किराए के मकान जैसा होता है। नौकरी रही तो मकान रहा, नौकरी गई तो मकान भी छूट सकता है। इसके विपरीत, पर्सनल हेल्थ इंश्योरेंस अपने घर जैसा होता है, जो नौकरी बदलने या छूटने से प्रभावित नहीं होता।

इसलिए हेल्थ इंश्योरेंस को केवल नौकरी का लाभ नहीं, बल्कि परिवार की बुनियादी सुरक्षा के रूप में देखना ज़रूरी है।

IRDAI के 2020 पोर्टेबिलिटी नियम क्या कहते हैं?

बीमा नियामक IRDAI ने 2020 में हेल्थ इंश्योरेंस की पोर्टेबिलिटी और माइग्रेशन से जुड़े स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए। इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पॉलिसीधारक नौकरी छूटने जैसी स्थिति में पूरी तरह असुरक्षित न हो जाए।

पोर्टेबिलिटी का अर्थ

पोर्टेबिलिटी का मतलब है अपनी मौजूदा हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी को किसी दूसरी बीमा कंपनी की इंडिविजुअल या फैमिली फ्लोटर पॉलिसी में स्थानांतरित करना।

ग्रुप से इंडिविजुअल पॉलिसी में माइग्रेशन

IRDAI के नियमों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति ग्रुप हेल्थ पॉलिसी से बाहर निकलता है—जैसे नौकरी छूटने पर—तो उसे इंडिविजुअल या फैमिली फ्लोटर पॉलिसी में माइग्रेशन का विकल्प दिया जाना चाहिए।

पोर्टेबिलिटी की समय-सीमा

यह सबसे महत्वपूर्ण जानकारी है, जिसे अक्सर लोग नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

  • IRDAI के दिशानिर्देशों के अनुसार, पॉलिसीधारक को अपनी मौजूदा पॉलिसी की रिन्यूअल डेट से कम से कम 30 दिन पहले पोर्टेबिलिटी के लिए आवेदन करना चाहिए। नौकरी छूटने के मामले में, अपने HR या बीमा कंपनी को अपने Last Working Day से पहले ही सूचित करना सबसे सुरक्षित है।
  • कुछ मामलों में बीमा कंपनी 30 दिन से कम समय में भी आवेदन स्वीकार कर सकती है, लेकिन यह पूरी तरह बीमाकर्ता के विवेक पर निर्भर करता है।
  • अंडरराइटिंग की स्थिति में बीमा कंपनी को 15 दिनों के भीतर अपना निर्णय पॉलिसीधारक को बताना होता है।

समय पर आवेदन न करने की स्थिति में पोर्टेबिलिटी का लाभ छूट सकता है।

वेटिंग पीरियड और अंडरराइटिंग से जुड़े नियम

IRDAI के नियम यह भी स्पष्ट करते हैं कि:

  • जो वेटिंग पीरियड पहले ही पूरा हो चुका है, उसे नई पॉलिसी में दोबारा नहीं लगाया जाना चाहिए।
  • केवल बचा हुआ (unexpired) वेटिंग पीरियड ही लागू किया जा सकता है।
  • ग्रुप से इंडिविजुअल पॉलिसी में माइग्रेशन के मामलों में अंडरराइटिंग की जा सकती है।

पोर्टेबिलिटी के लिए ज़रूरी दस्तावेज

पोर्टेबिलिटी प्रक्रिया शुरू करने से पहले ये दस्तावेज तैयार रखना उपयोगी होता है:

  • पोर्टेबिलिटी रिक्वेस्ट फॉर्म
  • मौजूदा हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी की कॉपी
  • पिछले वर्षों का पॉलिसी रिन्यूअल रिकॉर्ड
  • क्लेम हिस्ट्री (यदि कोई क्लेम लिया गया हो)
  • पहचान और पते का प्रमाण (KYC)
  • मेडिकल हिस्ट्री या डिक्लेरेशन फॉर्म
  • ग्रुप पॉलिसी के मामले में नियोक्ता द्वारा जारी कवरेज प्रमाण

IRDAI द्वारा जारी हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी नियम (आधिकारिक दस्तावेज़)

यह PDF भारतीय बीमा नियामक IRDAI द्वारा जारी हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी और माइग्रेशन से जुड़े आधिकारिक दिशानिर्देशों को दर्शाती है। इसमें ग्रुप से इंडिविजुअल पॉलिसी में बदलाव, वेटिंग पीरियड, अंडरराइटिंग और आवेदन समय-सीमा से जुड़े नियम शामिल हैं।

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अगर नई पॉलिसी लेनी पड़े तो किन बातों पर ध्यान दें?

यदि किसी कारण से पोर्टेबिलिटी संभव न हो, तो नई पॉलिसी लेते समय वेटिंग पीरियड, पहले से मौजूद बीमारियों का कवरेज, नेटवर्क अस्पताल और कमरे के किराए जैसी शर्तों को ध्यान से समझना ज़रूरी है।

सुपर टॉप-अप: प्रीमियम संतुलित रखने का तरीका

अगर पूरी पॉलिसी महंगी लग रही हो, तो बेस पॉलिसी के साथ सुपर टॉप-अप प्लान एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। इससे बड़े मेडिकल खर्च की स्थिति में सुरक्षा मिलती है और प्रीमियम अपेक्षाकृत कम रहता है।

समझिए कैसे सुपर टॉप-अप आपके पैसे बचाता है (उदाहरण: 30 साल का व्यक्ति, 2025 के अनुमानित प्रीमियम पर)

पॉलिसी का प्रकार कवरेज राशि अनुमानित सालाना प्रीमियम फायदा/नुकसान
केवल बेस पॉलिसी 10 लाख रुपये ₹12,000 - ₹15,000 महंगा है, पर कवरेज सीमित है।
बेस + सुपर टॉप-अप 5 लाख (बेस) + 15 लाख (टॉप-अप) = कुल 20 लाख ₹6,000 (बेस) + ₹2,000 (टॉप-अप) = ₹8,000 आधे प्रीमियम में दोगुना कवरेज!
नोट: यह प्रीमियम केवल एक उदाहरण है। वास्तविक कीमत आपकी उम्र, शहर और कंपनी पर निर्भर करेगी।

निष्कर्ष:

नौकरी छूटना अचानक हो सकता है, लेकिन हेल्थ इंश्योरेंस की तैयारी पहले से की जा सकती है। कंपनी के बीमा पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय, समय रहते पोर्टेबिलिटी और पर्सनल पॉलिसी के विकल्प समझना बेहद ज़रूरी है। सही जानकारी और सही समय पर लिया गया निर्णय आपको और आपके परिवार को बड़े आर्थिक जोखिम से बचा सकता है।

"याद रखें, नौकरी दोबारा मिल सकती है, लेकिन बीमारी के दौरान गंवाया गया समय और पैसा वापस नहीं आता। इसलिए आज ही अपनी पॉलिसी के कागज चेक करें।"

अस्वीकरण

यह जानकारी केवल जागरूकता के उद्देश्य से दी गई है। हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी या नई पॉलिसी लेने से पहले अपने बीमा सलाहकार या संबंधित बीमा कंपनी से वर्तमान नियमों और शर्तों की पुष्टि अवश्य करें।

हाँ, IRDAI के माइग्रेशन नियमों के तहत आपको यह अधिकार मिलता है। लेकिन इसके लिए आपको कंपनी छोड़ने से पहले या तुरंत बाद बीमाकर्ता को सूचित करना होगा। अगर बहुत देर हो गई, तो यह लाभ नहीं मिलेगा।

अगर आप सही समय पर 'पोर्ट' या 'माइग्रेट' करते हैं, तो आपने ग्रुप पॉलिसी में जितने साल बिताए हैं, उनका क्रेडिट आपको मिलेगा। यानी वेटिंग पीरियड जीरो से शुरू नहीं होगा। यह इसका सबसे बड़ा फायदा है।

हाँ, नियम वही रहते हैं। पॉलिसी ग्रुप की है, कंपनी बंद होने से आपका 'क्रेडिट' खत्म नहीं होता। आपको बस समय रहते बीमा कंपनी (TPA या Insurer) से संपर्क करके अपनी इच्छा जतानी होगी।

हाँ, अक्सर पर्सनल पॉलिसी का प्रीमियम ग्रुप पॉलिसी (जो कंपनी देती थी) से महंगा होता है। क्योंकि ग्रुप में रिस्क बंट जाता है, जबकि इंडिविजुअल में रिस्क केवल आप पर है। लेकिन यह सुरक्षा कवरेज जारी रखने की कीमत है।

यह बीमा कंपनी की अंडरराइटिंग पॉलिसी पर निर्भर करता है। अगर आपकी उम्र ज्यादा है या क्लेम हिस्ट्री है, तो कंपनी मेडिकल चेकअप मांग सकती है।